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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
सहा सहता रहा

सहा सहता रहा, जब तक
सहा, अब सह न पायेगा ।
उपेक्षित वह रहा तन का
पसीना, रंग लायेगा ।

न रोके पाँव भूखा का,
रुकेगा लाख तुम रोको,
नहीं परवाह गोली का,
न फाँसी की रही चिन्ता,

धमनियों का उबलता खून,
ठंढ़ाकर न पाओगे,
कुवलने से न कुवली
जा सकेगी, आज मानवता,

उबलता खून तन का,
क्रान्ति का दीपक, जलायेगा
उपेक्षित वह रहा तन का
पसीना, रंग लायेगा ।

चलाना है, न अब आरसान,
अत्याचार का डन्डा,
चलाना एक क्षण भी है
कठिन, अभ्यास का शुरान,

नहीं अब काम आयेगा,
मगर उपदेश का मरहम,
करो अब बन्द नारा, बन्द
अपना व्यर्थ का भाषण,

दबा इन्सान, अत्याचार,
दाँतों से चलायेगा
उपेक्षित वह रहा तन का
पसीना, रंग लायेगा ।

लगी जो आग प्राणों में,
बुझायें, बुझा नहीं सकती,
वचाने के लिए, बलिदान,
यह, बलिदान जागा है,

उठा तूफान यह इन्सानियत
का पश, दिखायेगा ।
उपेक्षित वह रहा तन का
पसीना, रंग लायेगा ।

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