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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
नहीं

साफ दिल, होता न जब तब गीत का ।
स्वर नहीं भाता, मधुर संगीत का ।
अनमने मन से, न रागती गहर महिफल,
स्नेह विन, जलता न दीपक प्रीति का ।

धूल है, कीगत नहीं, उरा दिल की ।
चेतना जिरागें नहीं, रागग्मान की ।
है नहीं वरदान, वह अभिशाप है,
प्रेरणा, जिरागें नहीं कल्याण की ।

त्याग जिरागें है नहीं, वह प्रण नहीं ।
मन श्रद्धा से नत न हो, अर्पण नहीं ।
थाल मोती और कंचन से भरा,
व्यर्थ, जब तक भावना पावन नहीं ।

साधना क्या है, नहीं जिरागें लगन ।
प्रार्थना क्या है, नहीं जिरागें नगन ।
ढेंग से मिलती कभी मंजिल नहीं,
व्यर्थ पूजन ध्यान, यदि लगता न मन ।

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