मुझे नास्तिक कहो परवाह नहीं ।
आस्तिक कहलाने की चाह नहीं ।
मगर उन पुजारियों से अच्छा हूँ,
जिनके दिल में कुदरती आह नहीं ।
मुझे विशालता की, अभिलाष नहीं ।
सूक्ष्मता से हूँ मैं निराश नहीं ।
मगर महासागरों से अच्छा हूँ,
जिनके जल से, उतरती प्यास नहीं ।
गढ़ सका कीगती ताजमहल, नहीं ।
प्यार का विज्ञापन करूँ बल नहीं ।
मगर उस वादशाह से अच्छा हूँ,
जिसके पास सब कुछ सिर्फ दिल नहीं ।
भीड़ में छिपा व्यक्ति हूँ वलेष नहीं ।
मंच की अन्तिम पंक्ति हूँ, वलेष नहीं ।
मगर उस सेवक से अच्छा हूँ,
जिरागें सेवा का भाव, शेष नहीं ।
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