मैं वक्ता हूँ,
जो मन में आता है, बकता हूँ,
स्वतंत्रता ने, आखिर वही तो, केवल यही अधिकार दिया है,
इस अधिकार का, सदुपयोग करता हूँ,
यही मैं समझाता हूँ,
मैं वकता हूँ
वे गद्दी के लिए वकते हैं,
गांजी पद के लिए वकते हैं,
और मैं पेट के लिए वकता हूँ,
उनका मुकाबला मैं कैसे कर सकता हूँ ।
कहाँ राना गाँव,
कहाँ गंगू तेली,
दिल्ली गुडारी दूर है ।
केवल बकना ही तो,
इस जिन्दगी को वदा है,
बक कर, अपनी भूख मिटाता हूँ,
बक कर, बीमार परिवार चलाता हूँ ।
जब मेरी राधा,
मेरी मजबूरियों की ओर, मेरा ध्यान दिलाती है,
तो, बक कर, उरा पर झुंझलाता हूँ,
बक कर, उरा पर अपना गुरसा उतारता हूँ,
मन में गुब्बार लिए सो जाता हूँ ।
मैं मजबूरियों के आगे झुकता हूँ,
मैं बकता हूँ ।
टूटी चारपाई छोड़ कर,
सुबह जब उठता हूँ,
पाखाने पर, मगों का कतार, देख कर, वकता हूँ ।
पानी के नल पर भीड़, बाल्टी की घर मार, देखकर, बकता हूँ ।
राशन की दूकान वाले का, चोर बाजार, देख कर बकता हूँ ।
राड़कों पर गन्दगी का ढेर,
तथा, सफाई की जरूरत, देखकर, बकता हूँ ।
क्या करूँ, बकने की आदत सी पड़ गई है,
पग-पग पर, बकता ही रहता हूँ ।
मैं बकता हूँ ।
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