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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
बापू के नाम पाती

पूज्यनीय,
बापू
दण्डवत

तुमने पूछा है, अपने लाड़लों का समाचार,
जनता जनार्दन के प्रति, उनका व्यवहार ।

चुपके से लिख रहा हूँ,
वरना,
पकड़ लिया जाऊँगा ।
शासक की जुल्मों की जंजीरों में,
जकड़ दिया जाऊँगा ।

हाँ, तो तुम्हारे लाड़ले,
बहुत,
आगे बढ़ चुके हैं ।
अपना अपना,
आलीशान,
महल गढ़ चुके हैं ।

बड़कपन आ गई इतनी कि,
छोटों से बात नहीं करते ।
जनता जनार्दन से दूर रहते हैं,
मुलाकात नहीं करते ।

तुम्हारे सपनों के
राम राज्य में,
बोल-बाला है,
भ्रष्टाचार का,
चोर बाजार का,
तस्कर व्यापार का ।

मगर मेरे प्यारे बापू,
पत्र पढ़ कर,
अफसोस,
मत करना ।
तुम्हारे लाड़ले
आज,
शासक हैं,
उन पर,
रोष
मत करना ।

अगर मेरी बात नहीं,
मानोगे ।
और वही,
अनसन वाला,
पुराना व्रत,
ठानोगे ।
तो,
समझ लो,
राजघाट पर भी,
रहने नहीं,
पाओगे ।
स्टालिन की तरह
कब्र से उखाड़कर
फेक दिए जाओगे

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