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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
छोड़ दे माझी

छोड़ दे माझी किनारा छोड़ दे ।

ध्येय लेकर जो बढ़ा है,
पाँव, पाया है किनारा
रास्ते में जो खड़ा था व्यवधान
बन जाता सहारा,

छोड़ दे लंगर लहर पर,
नाव को आगे बढ़ाओ,
अटल मन की चाह को
कब, रोक पाई कठिन धारा,

बात मेरी मान, माझी, अब किनारा छोड़ दे ।
छोड़ दे माझी, किनारा छोड़ दे ।

नीर गहरा देख कर,
पीछे कदम रखना पड़ेगा,
बाँध कर हिम्मत ऐ ! माझी,
नाव को आगे बढ़ाओ,

हाथ में पतवार लेकर, धार का रूख मोड़ दे ।
छोड़ दे माझी, किनारा छोड़ दे ।

छोड़ कर भय, आज माझी,
नाव को, आगे बढ़ाओ,
क्योंकि जितने है पथिक,
राब चाहते हैं पार जाना,

दो किनारों को, मिलन की डोर से, तू जोड़ दे
छोड़ दे माझी, किनारा छोड़ दे ।

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