कह दो बन्धन से कि, अपनी वह कारत छोड़ दे,
मुस्कराता चाँद, नभ में आ गया है ।
हास अम्बर के अधर पर,
गुनगनाती रात है,
हर नयन में कामनाओं
की नई सौगात है,
खिल गई है चाँदनी में
प्यार की, कलियाँ मनोहर,
कर रही श्रृंगार बसुधा,
सज रहा जलजात है,
कह दो पीड़ासे कि, अपना वह स्वयं घट फोड़ दे,
मुस्कराता चाँद, नभ में आ गया है ।
चाँदनी है, सब क्षमा है,
कुछ करो, अधिकार है,
खोल दो पट अब हृदय का,
साज हर तैयार है,
कह दो धारा से कि, अपनी वह विकटता तोड़ दे,
मुस्कराता चाँद, नभ में आ गया है ।
यामिनी में कुमुद का घूँघट
उठाया जा रहा है,
आ गई बारात तारों की,
चमन मुस्का रहा है,
कह दो बन्धन की कि अपनी वह शरारत छोड़ दे,
मुस्कराता चाँद नभ में आ गया है ।
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