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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
जब बँधी जिन्दगी प्यार की डोर से

स्नेह का दीप लेकर चला जब मनुज,
जिन्दगी हँस पड़ी तब मिलन भोर से ।

जगो लगी कल्पना, हर गली,
स्वप्न साकार होने लगे प्यार के,
आँख में कामना, मुस्कराने लगी,
मौत जाने लगी द्वार से, हार के,

प्यार का घट बुझा जब मनुज का अधर,
रागिनी गा पड़ी तब किसी, ओर से ।

झाँकते हैं सितारे, नयन डाल से,
राग अम्बर सुनाने लगा है मधुर,
रूप घूँघट निकाले, मिलन रात में,
बढ़ रहा चूमने की किसी का अधर,

जब धरा ने बुलावा दिया, चाँद को,
चाँदनी मुस्कराई गगन छोर से ।

रात रानी खिली, खिल गये सब सुमन,
यामिनी में कुमुद खिलखिलाने लगी,
यह धरा सज गई, सज गया हर सपन,
प्यास प्यासी जवानी, बुझाने लगी,

चाह लेकर हृदय में चला जब मनुज,
रूक न पाया विरह तब मिलन भोर से ।

और बन्धन नहीं तोड़ पाया मिलन,
जब बँधी जिन्दगी प्यार की, डोर से ।

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