उस चौराहे पर जीवन है,
जो हर साधों का मरघट है ।
चाहों की आशा लिए चलता,
ढोता आहों की गठरी मन,
आशाओं से रिस्ता टूटा,
टूटा हर सपना का दर्पण,
उस पनघट पर है, प्यास खड़ी,
तट दुर्गम, रीता हर घट है ।
उस चौराहे पर जीवन है,
जो हर साधों का मरघट है ।
अभिलाषाओं के लिए अरे,
है चिता, जमी, आकाश कफ़न,
अरमानों की हर बगिया में,
फूल सा रे चुमता है, सुमन,
अभिलाशायें उस बगिया में,
जिसमें तैयार चुभन-वट है ।
उस चौराहे पर जीवन है,
जो हर साधों का मरघट है ।
रोता सूरज, रोता अन्तर,
रोता रग-रग, रोता कण-कण,
रोती धरती, रोता सागर,
रोती साँसे, रोता वन-वन,
उस हद पर खड़ी विवशता है,
है रटन जहाँ, केवल रट है ।
उस चौराहे पर जीवन है,
जो हर साधों का मरघट है ।
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