फूल के पथ ने दिया था, नींद में सपना,
शूल के पथ ने सिखाया था, मुझे चलना ।
रात थी, जब चाँदनी,
आराम करता था,
था अंधेरा, जब तलक
बन दीप जलता था,
प्राण को भाया न मेरे,
सुबह का होना,
सहन कर पाया न जीवन,
एक क्षण खोना,
रात के मन ने सिखाया
दीप बन, जलना ।
शूल के पथ ने सिखाया,
था, मुझे चलना ।
दूर तट से, दूर जब
मझधार का आँचल,
जब मिला मझधार तब
जा मिल सका साहिल,
डर न लगता, संकटों
से सत्य कहता हूँ,
मैं भयंकर आँधियों
से, प्यार करता हूँ,
धार की गति ने सिखाया,
हो निडर, बहना ।
शूल के पथ ने सिखाया,
था, मुझे चलना ।
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