गई लूट ले गई हृदय से,
मौसम, मधुर बहार का ।
मन-उपवन की कली कली,
डर डाल पात बेहाल है,
नयन नगर में होठ डगर में,
प्राण-गली हड़ताल है,
भुरझाया, हर सुमन प्यार का,
राजा गंध उदास है,
मायूसी है पोर-पोर में,
यौवन गिनता साँस है,
गई, दे गई, राग सिसकता
प्राण-चमन के प्यार का ।
गई लूट ले गई हृदय से,
मौसम मधुर, बहार का ।
रात न भाती, दिवस न भाता,
और न भाती शाम है,
चन्दा खलाता, सूरज छलता,
प्राण जलाता धाम है,
गई बनाकर, चली गई रे,
पंथी डगर-मजार का ।
गई लूट ले गई हृदय से,
मौसम मधुर, बहार का ।
रामायण गीता की सारी,
बातें, लगती झूठी हैं,
वेद-चमन के सारे तरूवर,
लगते जैसे झूठे हैं,
गई बुझाकर चली गई रे
दीप ज्ञान मन द्वार का ।
गई लूट ले गई हृदय से,
मौसम मधुर, बहार का ।
पाठक टिप्पणियाँ