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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
गई लूट ले गई

गई लूट ले गई हृदय से,
मौसम, मधुर बहार का ।

मन-उपवन की कली कली,
डर डाल पात बेहाल है,
नयन नगर में होठ डगर में,
प्राण-गली हड़ताल है,

भुरझाया, हर सुमन प्यार का,
राजा गंध उदास है,
मायूसी है पोर-पोर में,
यौवन गिनता साँस है,

गई, दे गई, राग सिसकता
प्राण-चमन के प्यार का ।
गई लूट ले गई हृदय से,
मौसम मधुर, बहार का ।

रात न भाती, दिवस न भाता,
और न भाती शाम है,
चन्दा खलाता, सूरज छलता,
प्राण जलाता धाम है,

गई बनाकर, चली गई रे,
पंथी डगर-मजार का ।
गई लूट ले गई हृदय से,
मौसम मधुर, बहार का ।

रामायण गीता की सारी,
बातें, लगती झूठी हैं,
वेद-चमन के सारे तरूवर,
लगते जैसे झूठे हैं,

गई बुझाकर चली गई रे
दीप ज्ञान मन द्वार का ।
गई लूट ले गई हृदय से,
मौसम मधुर, बहार का ।

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