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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
समझ न पाई मौन इशारा

समझ न पाई मौन इशारा,
अनुभवहीन जवानी मेरी ।

घर से बाहर दरवाजे पर,
देर-देर तक, बैठे रहना,
कभी दुपट्टे की जाली से,
कभी बटन से कौतुक करना,

कभी चोटियों को पीछे से,
आगे लाकर छटका देना,
कभी फेंक कर प्यासी नजरे,
फेर नजर फिर अपने लेना,

पा न सकी वह प्यार किनारा,
अनुभवहीन जवानी मेरी,

पास बुलाने का उपक्रम है,
रह-रह कर अंगड़ाई लेना,
तोड़ अंगुरियों के पोरों को,
सींच-सींच कर, फिर हँस देना,

समझ न पाई कौतुक सारा,
अनुभवहीन जवानी मेरी ।
समझ न पाई मौन इशारा,
अनुभवहीन जवानी मेरी ।

जाती लौट प्राण की लहरें,
कभी होठ के तट पर आकर,
कभी नयन के पलकों को छू,
हो जाती विलीन घूर्मा कर,

कभी तेज रफतार साँस की,
और कभी मुख पर झुँझलाहट,
रीता गागर सिर पर रखकर,
पा जाने को व्याकुल, पनघट,

अपना सकी न, मिला सहारा,
अनुभवहीन जवानी मेरी ।
समझ न पाई मौन इशारा,
अनुभवहीन जवानी मेरी ।

समझ न पाई मौन इशारा,
अनुभवहीन जवानी मेरी ।

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