कैसे मिलता हास मुझे, अभिवादन का ।
स्वर मेरा जब रहा विरोधी, शोषण का ।
जब भी उन राहों में चले पाँव मेरे,
दिन पीड़ामें, रातें जिनकी आहों में,
जीवन भर जो रहे शिकार विषमता के,
जो पायें अभिशाप विवशता, चाहों में,
कैसे मिलता प्यार, महल के प्रांगण का ।
भरता रहा गवाही जब मैं निर्धन का ।
माली उनका, आती जहाँ बहार नहीं,
पहरा देता, जिनका पहरेदार नहीं,
जिनका कोई घाव नहीं है सहलाता,
उनकी मंजिल, जिनका घर संसार नहीं,
कैसे पाता मूल्य, प्राण के गायन का ।
जिनमें रोदन क्रन्दन, जनसाधारण का ।
रहते जो गंदी वस्ती, में गाँवों में,
पड़ी नाव जिनकी मझधार बहावों में,
रहा पताका उनका सदा उड़ाता मैं,
ताकत, लेकिन क्रान्ति नहीं है पावों में,
कैसे कवि का जीवन होता, साधन का ।
जो करता है घोर विरोध कुशासन का ।
कैसे मिलता हास मुझे, अभिवादन का ।
स्वर मेरा जब रहा विरोधी, शोषण का ।
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