← कविता सूची
— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
आज स्वदेशी

बदल गया मौसम उपवन का,
रग-रग पुलकित वृन्दावन का,
आज स्वदेशी माली, लेकिन
देशी गंध-बहार, नहीं है ।

अपनी नैया, स्वयं खेवैया,
लहर धार प्रतिकूल नहीं है,
है मझधार न बाधा पथ में,
दूर नाव से, कूल नहीं है,

अपने कर में, अपना लंगर,
है तूफान न, आज बवण्डर,
आज स्वदेशी नाविक, लेकिन
देशी कर पतवार, नहीं है,
आज स्वदेशी माली, लेकिन
देशी गंध बहार नहीं है ।

सचमुच आज नहीं आंगन में,
रात अमावस की है काली,
हम स्वतंत्र, मनायें चाहे
ईद पर्व या पर्व दिवाली,

आज स्वदेशी दीपक, लेकिन
तेल स्वदेशी धार नहीं है ।
आज स्वदेशी माली, लेकिन
देशी गंध-बहार नहीं है ।

अपने श्रम से, अपने बल से,
करते है, निर्माण भवन का,
ईंट स्वदेशी, गारा देशी
और सजावट, अपने मन का,

अपना घर है, अपना आंगन,
अपना मंदिर, अपना पूजन,
पहरे दार स्वदेशी, लेकिन
स्वर देशी व्यवहार नहीं है ।
आज स्वदेशी माली लेकिन
देशी गंध-बहार नहीं है ।

papaji Photo
← कविता सूची

पाठक टिप्पणियाँ