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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
साथी दीप जलाता चल

हँसता और हँसाता चल,
साथी दीप जलाता चल,
देश-राग को छोड़ आदमी,
मानवता से प्यार करे ।

चाहों में हो नई जवानी,
पावों में हो नई रवानी,
ध्येय अटल हो ऐसे, जैसे,
बहता, गंगा का है पानी,

आँधी में मुस्काता चल,
तूफानों में गाता चल,
ऐसा उसा पाँव बढ़ाओ कि फिर
नमन तुझे, मझधार करे,
देश राग को छोड़ आदमी,
मानवता से प्यार करे ।

दीपक में कल्याण भरा हो,
हर लौ में अरमान भरा हो,
जल सकता है दीप कि जिसमें
साहस और, अभियान भरा हो,

पथ-पथ फूल बिछाता चल,
बिगड़ी बात, बनाता चल,
ज्योति किरण ऐसे फैले कि
गमन अरे, अँधियार करे,
देश राग को छोड़ आदमी,
मानवता से प्यार करे ।

कोई कोना रहे न खाली,
झूमे हर उपवन की डाली,
मेहंदी हाथ रचायो प्यार,
स्नेह करे इसकी रखवाली,

घर-घर स्नेह, लुटाता चल,
औरों को बहलाता चल,
ऐसा काम करो साथी जो,
औरों का, उपकार करे,
देश-राग को छोड़ आदमी,
मानवता से प्यार करे ।

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