निर्धनता अभिशाप न होती,
निर्धन होना पाप न होता,
मेरा भी यौवन लहराता,
मैं भी गीत मिलन का गाता।
कंचन के मजबूत हथौड़े,
से टूटे बचपन के वादे,
प्रतिमा नहीं पसीज सकी है,
सुनकर निर्धन की फरियादें,
भेद नहीं यदि प्रतिमा करती,
धन का सिर्फ न स्वागत करती,
मैं भी वरदानों का आँचल,
सुबह-शाम प्रतिमा से पाता ।
ऊँच-नीच की, दीवारों ने,
बाँट दिया है मन का आंगन,
जाति-पाँति के जादूगर ने,
ही तोड़ा मन का अनुबन्धन,
धर्म अगर मिलना सिखलाते,
और प्यार का पाठ पढ़ाते,
मन का सपना, फूल प्यार का,
बन कर होठों पर खिल जाता ।
मंदिर मस्जिद की सरहद को,
दुनिया ने, निश्चित कर दी है,
एक दूसरे से मिलने की
आशा से वंचित कर दी है,
पावनता मंदिर में होती,
मस्जिद अगर न बाधा देती,
प्रेम नगर निर्मित कर जग में,
स्नेह द्वार पर, दीप जलाता ।
निर्धनता अभिशाप न होती,
निर्धन होना पाप न होता,
मेरा भी यौवन लहराता,
मैं भी गीत मिलन का गाता ।
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