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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
मेरे वस की

यह तो था संयोग कि तुमसे,
मुलाकात हो गई डगर में,
वरना मंजिल को पा जाना,
मेरे बस की बात नहीं थी ।

जिस रस सरिता की धारा में,
अक्सर किस्ती पार न होती,
उसके तल में जा चुन लाना,
मेरे लिए कठिन था मोती,

यह तो मेरा भाग्य, कि तुम सा,
चुतर साथ देने वाला था,
वरना तल से, मोती लाना,
मेरे बस की बात नहीं थी,

जिसके नखरे के दलदल में,
काम नहीं आती चतुराई,
वह कठिनाई, पार कर गई,
मेरी नाबालिग तरुणाई,

यह तो तेरी ममता का फल,
होना पड़ा निराश न मुझको,
वरना दलदल में चल पाना,
मेरे बस की बात नहीं थी ।

पग-पग पर है, जहाँ भुलावा,
समझ न पाता भाव, उपासक,
मैं था अनुभवहीन पुजारी,
पहुँच न पाता गहराई तक,

यह तो तेरी दया, कि जिससे
दीप जल उठा, भक्ति भाव का,
वरना दीपक ज्योति बढ़ाना,
मेरे बस की बात नहीं थी ।

चुभ जाते हैं शूल जहाँ पर,
फूल जहाँ पर उलझाते हैं,
खुल जाती है गाँठ कसम की,
सपने प्यार बिखर जाते है,

यह तो तेरा प्यार कि जिससे,
बजती रही बाँसुरी मन की,
वरना गीत प्यार का गाना,
मेरे बस की बात नहीं थी ।

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