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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
छाई रही उदासी

छाई रही उदासी जब तक
मिली न मन की सारी यारों,

इस आंगन से उस आंगन तक,
उस पनघट से इस पनघट तक,
रही भटकती चाह हृदय की,
बंशी-बट से यमुना तट तक,

उम्र ढल गई, साँस रूक गई,
मिले न कृष्ण मुरारी यारों
छाई रही उदासी जब तक,
मिली न मन की सारी यारों ।

मिले लुटेरे गिरजा घर में,
मस्जिद में ईमान न पाया,
बौद्ध-मठों में हिन्सक लामा,
मन्दिर में भगवान न पाया,

किसी धर्म के देवालय की,
खुली न बन्द, किवारी यारों,
छाई रही उदासी जब तक
मिली न मन की सारी यारों ।

किसी रात में चैन नहीं था,
मातम छाया उत्सव के दिन,
उत्तर से दक्षिण आतंकित,
पूरब था पश्चिम का दुश्मन,

बिलख रही थी, प्यास होठ पर,
लेकर, शांति विचारी यारों,
छाई रही उदासी जब तक
मिली न मन की सारी यारी,

सबकी अलग-अलग बस्ती थी,
सबकी अलग-अलग हस्ती थी,
सबकी अलग-अलग किस्ती थी,
सबकी अलग-अलग मस्ती थी,

ज्ञात नहीं था एक डगर है,
मंजिल एक सवारी यारों
छाई रही उदासी जब तक
मिली न मन की सारी यारों ।

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