रात चाँदनी है मतवाली,
झूम रही मन-उपवन डाली,
बस जाने दो, उर के अन्दर,
खुला द्वार, मन के आंगन का,
भुजपाशों से बढ़ कर, कोई
आकर्षक, श्रृंगार नहीं है,
बाँहों के हारों से बढ़ कर
और गले का हार नहीं है,
बाँहों का स्पर्श, मधुर है,
अन्तर से उठ रही लहर है,
बँध जाने दो भुज बन्धन में,
बन्धन ही बन्धन है प्रण का,
नरम-नरम होठों के चुम्बन,
तृषित अधर पर, महक रहे हैं,
जैसे मधुमासों में मधुकर,
कली होठ पर, चहक रहे हैं,
ताजमहल, होठों पर बनता,
जहाँ प्यार का दीपक जलता,
ढल जाने दो प्यार उदधि में,
आकुल सावन है, यौवन का,
मन कहता वह तन सुनता है,
दोनों का सम्बन्ध मधुर है,
शरम नहीं है बाधक पथ में,
क्योंकि यह तो प्रीति डगर है,
तन से तन का है गठबन्धन,
प्राणों से प्राणों का बन्धन,
मिल जाने दो, धरती अग्बर,
एक साध यह है दो मन का,
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