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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
विज्ञान, प्रगति तथा चाँद

मानव का मैं कहूँ लडकपन,
या समझूँ उसका पागलपन,
जब धरती को छोड़ ललकता,
चाँद पकडने का उसका मन ।

प्रगतिशीलता के अन्धड़ में,
लक्ष्यहीन वह बहा जा रहा,
मानवता का गीत छोड़ कर,
मरघट का वह गीत गा रहा,

धरती को शमशान बनाने,
वाला क्या विज्ञान ज्ञान है,
है मनु का जो चैन छीनकर,
बारूदी हथियार ला रहा

इसे सृजन की चाह, कहूँ मैं,
या विनाश का महा निमन्त्रण,
जब धरती को छोड़ ललकता,
चाँद पकड़ने का उसका मन ।

इसकी शक्ति, जानता
है हिरोशिमा का ही अन्तर,
आँसू धरती की आँखों में,
है कराहता, ऊपर अम्बर,

उत्पीड़न का धुँवां उड़ाने
वाला, क्या विज्ञान ज्ञान है,
तोड़ प्यार के प्रतिमा का जो,
घृणा-देश का है भरता स्वर

कहूँ इसे मैं, ज्ञानहीनता,
या अज्ञानी का आकर्षण,
जब धरती की छोड़ ललकता,
चाँद पकड़ ने का उसका मन ।

खोल रहा अध्याय समापन,
जो धरती का, मानवता का |
बुला रहा है, इस धरती पर,
अन्धकार, जो नीरवता का ||

मानवता का दीप बुझाने,
वाला, क्या विज्ञान ज्ञान है
तोड़ रहाजो मनु से नाता,
घृणा-देश का है भरता स्वर
धरती माता की ममता का

कहूँ इसे मैं विश्व विसर्जन,
या इसको अध्याय समापन,
जब धरती को छोड़ ललकता,
चाँद पकड़ ने का उसका मन

जिससे भला न हो धरती का,
प्रगति और अनुमान व्यर्थ है,
प्रेम न करना, सिखलाता जो,
सागर सम वह, ज्ञान व्यर्थ है,

इस धरती को नर्क बनाने,
वाला क्या विज्ञान ज्ञान है |
लक्ष्य यही यदि है इसका तो,
विकसित यह विज्ञान व्यर्थ है ||

विकृत ज्ञान कहूँ इसको या
उहापोह का केवल सर्जन,
जब धरती की छोड़ ललकता,
चाँद पकड़ ने का उसका मन ।

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