ओ ! मेरे दर्दीले होठो,
इतना दर्द जगत से माँगो,
तड़पन होठों की बन जाये,
तनहाई के आंगन महिफल ।
सागर की गहराई में ही,
जाने से मिलते हैं मोती,
मझधारों के पाने से ही,
दूरी कम साहिल की होती,
भँवरों से भयभीत हुआ जो,
उसका ध्येय न पूरा होता,
पतवारी पर रहने वाला
निर्भर, जीवन भर है रोता,
ओ ! मेरे उलझन के पावों,
इतनी बाधा जग से माँगो,
लहरों के उत्ताल तरंगों में,
आकर, अपना ले साहिल ।
आँसू आँखों में आता है,
अन्तर मन की पीड़ा हरने,
तप्त आह की ज्वालाओं का,
ताप मिटा कर,शीतल करने,
सिखलाता, नयनों का पानी,
तूफानों के पथ में चलना,
दु:ख की आँधी के झोकों में,
साहस का पग, आगे रखना,
मिलती नहीं उपेक्षा जब तक
मन के सोए भाव न जगते,
जब तक नहीं सताता पतझर,
अश्रु बने आँखों का काजल ।
मन की वीणा झँकृत होते,
जब होती हैं साधे प्यासी,
बंध पाते हैं छंद स्वरों में,
मन में पीड़ा रहे उदासी,
ओ मेरी अकुलाई साधों,
इतनी घोर उपेक्षा मांगो,
पीड़ा की वीणा का यौवन
बन जाए गीतो का आंचल।
ओ ! मेरी सावन की आँखों,
इतना अश्रु, जगत से माँगो,
ज्वाला आहों की कम करने,
शब्द न बंधते गीत न बनते,
सुख के दिन पा, हम सोते हैं,
लेकिन दु:ख जीना सिखलाता,
सीख लिया जो जीना दु:ख में,
उसके पथ से, तम हट जाता,
पग पर झुक जाता है अम्बर,
पर्वत समतल हो जाता है,
बाधा पथ पर फूल बिछाती,
जिस पथ पर साहस गाता है।
ओ ! मेरी उर अभिलाशाओं,
इतनी बाधा जग से माँगो,
जिस पथ पर तुम पाँव बढ़ाओ,
बाधायें बन जायें मंजिल ।
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