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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
मैं अन्धकार से

तुम रात चाँदनी ले लो,
मैं अन्धकार से, आलिंगन कर लूँगा ।

हर नई सुबह की नई किरण, अपना लो,
हर चमन बहारों का, गलहार बना लो,
दो छोड़ मुझे तुम आँसू के पनघट पर,
तुम खुशियों का, आंगन त्योहार मना लो,

तुम साज, मिलन का ले लो,
मैं बिछुड़न का अभिशाप, वरण का लूँगा ।

लहरों की लहराती मस्ती, पा जाओ,
वरदानों की अविचल हस्ती, पा जाओ,
मुझे दो छोड़ मझधारों की राहों पर,
साहिल कि इकलौती किस्ती, पा जाओ,

तुम तट का चुम्बन, ले लो,
मैं मझधारों से, गठगन्धन का लूँगा ।

तेरी हर अभिलाषायें, व्याह रचायें,
मधुमास प्यार के उपवन, फूल खिलायें,
दो छोड़ मुझे तुम पतझर के क्रन्दन में,
मुस्कान होठ पर तेरे वीन, बजायें,

तुम वीणा का स्वर, ले लो,
मैं भाव हृदय का स्वयं, शमन कर लूँगा ।

जिस डगर चलो, खुद ही बन जाये मंजिल,
तेरे होठों पर, खुशी सजायी महफिल,
दो छोड़ प्रिये ! मेरी हालत पर, मुझको
तुम जगो हटे अम्बर से तम का आँचल,

तुम सार जिन्दगी, ले लो,
मैं गिरे वज्र का घाव सहन कर लूँगा ।

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