← कविता सूची
— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
फूल शूल के

मेरे प्यार न तुम अकुलाओ,
मत आँखों से अश्रु बहाओ,
फूल शूल के आंगन, खिलता,
तनहाई में सजती महिफल ।

देख शलभ का जल-जल मरना
रात अंधेरी ढल जाती है,
देख पथिक के पग में छाले,
मंजिल पास चली आती है,

मेरी चाह, निराश न होना,
मेरी साधो, धीर न खोना,
पथ पर चलते हुए पाँव का,
ही स्वागत, करती है मंजिल,

आश नहीं यदि होती मन में,
चातक प्यास नहीं सह पाता,
और न मौसम अगर बदलता,
उपवन का धीरज लुट जाता,

ओ ! इच्छाओं, मत घबड़ाओ,
अभिलाषाओं, मत पछताओ,
चातक के प्यासे होठों को,
देता नहीं निराशा बादल ।

मझधारों की बाधाओं को,
झुकना पड़ता प्रण के आगे,
कोई भँवर नहीं ऐसी जो,
नहीं जटिलता अपनी त्यागी,

मेरे हाथों की पतवारी,
कभी न अपनी हिम्मत हारी,
डूब-डूब कर उतराने वाले,
को, अपना लेता साहिल,

जाती व्यर्थ न कभी तपस्या,
जब रहती उसमें पावनता,
स्वार्थ रहित, साधक के पग पर,
शीष झुकाती, स्वयं सफलता,

लगन न मन की अपने तोड़ो,
पावनता का साथ न छोड़ो,
साधक के पावन प्रण को ही
पकड़ा देती प्रतिमा आँचल ।

papaji Photo
← कविता सूची

पाठक टिप्पणियाँ