मेरे प्यार न तुम अकुलाओ,
मत आँखों से अश्रु बहाओ,
फूल शूल के आंगन, खिलता,
तनहाई में सजती महिफल ।
देख शलभ का जल-जल मरना
रात अंधेरी ढल जाती है,
देख पथिक के पग में छाले,
मंजिल पास चली आती है,
मेरी चाह, निराश न होना,
मेरी साधो, धीर न खोना,
पथ पर चलते हुए पाँव का,
ही स्वागत, करती है मंजिल,
आश नहीं यदि होती मन में,
चातक प्यास नहीं सह पाता,
और न मौसम अगर बदलता,
उपवन का धीरज लुट जाता,
ओ ! इच्छाओं, मत घबड़ाओ,
अभिलाषाओं, मत पछताओ,
चातक के प्यासे होठों को,
देता नहीं निराशा बादल ।
मझधारों की बाधाओं को,
झुकना पड़ता प्रण के आगे,
कोई भँवर नहीं ऐसी जो,
नहीं जटिलता अपनी त्यागी,
मेरे हाथों की पतवारी,
कभी न अपनी हिम्मत हारी,
डूब-डूब कर उतराने वाले,
को, अपना लेता साहिल,
जाती व्यर्थ न कभी तपस्या,
जब रहती उसमें पावनता,
स्वार्थ रहित, साधक के पग पर,
शीष झुकाती, स्वयं सफलता,
लगन न मन की अपने तोड़ो,
पावनता का साथ न छोड़ो,
साधक के पावन प्रण को ही
पकड़ा देती प्रतिमा आँचल ।
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