कैसी मेरी साध अधूरी,
हो पाती जीवन में पूरी,
जिस प्रतिमा पर प्यार समर्पित,
जब उसका मन था, पाहन का ।
हुई उल्लंघित इच्छाओं से,
जब निर्धनता की सीमायें,
क्यों न विश्व की नजरों में तब,
इच्छायें दोषी बन जायें,
कैसे इच्छाओं का उपवन,
पाता पहन मिलन का कंगन,
साथ चाहता मन था, जिसका
वह न चाहता था निर्धन का,
लहरों को मंजूर नहीं था,
चाहो को मिल सके किनारा,
माझी को स्वीकार नहीं था,
पतवारों का मिले सहारा,
कैसी मेरी किस्ती प्रण की,
ग्रास बनती, क्षण दो क्षण की,
हाथों में पतवार न जिसके,
मूल्य नहीं जब उसके प्रण का,
अरमानों को पता नहीं था,
पावनता अभिशाप, यहाँ है
स्नेह सुमन को ज्ञात नहीं था,
अर्पित होना पाप यहाँ है।
कैसे श्रद्धा सुमन का आँचल,
नहीं पोछता आँखों का जल,
जहाँ अपेक्षित थी पावनता,
वहाँ उपेक्षा श्रद्धा सुमन का |
बिखर गई मन की अभिलाशा
देख रूप के व्यवहारों को,
चूर हुए सपने जीवन के,
देख मिलन के त्योहारों को,
कैसे जतन सपन जीवन के,
नहीं पहनते कफन मिलन के,
जब न आश की किरण चूमती,
गीत, प्यार वाले आँगन का ।
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