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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
मैं गायक

मैं गायक वीरान चमन का,
आँसू भरे उदास नयन का,
गा न सकूँगा गीत प्यार का,
मधुमासों का और मिलन का ।

मैं उनका, जिनकी हर साधे,
मन के तट पर ही रह जाती,
आँसू की धारों में, किस्ती,
अभिलाषाओं की बह जाती,

पतवारें उम्मीद की, जिनके
हाथ नहीं हैं साथ नहीं हैं,
जिनकी इच्छाओं की मंजिल,
मिलने से पहले ढह जाती,

मैं उनका, जिनकी सीतायें,
नंगी-भूखरी, वक्त काटतीं,
बहता तन से रक्त पसीना,
उनकी, संतानें दुख पाती,

श्रम के बेटे की बेटी का,
हाथ न पीला हो पाता है,
जिनकी माताओं की अर्थी,
बिना कफन ही हैं जल जाती,

मैं उनका, जिनकी बस्ती में,
नेताओं की नजर न जाती,
आजादी की नहीं रोशनी,
जिनका, घर आँगन चमकती,

मैं उनका, जिनके बेटों ने,
आजादी का दाम चुकाया,
तोड़ गुलामी की जंजीरे,
स्वतंत्रता का दीप जलाया,

उनका पेट नहीं भरता है,
वस्त्र न उनको मिल पाता है,
अपना सब कुछ न्यौछावर कर,
जिसने, सूनापन अपनाया,

मैं लिखता हूँ गीत कि जिनका
टूट गया हर सपना मन का
मैं चलता हूँ साथ के जिनका,
साथ अभावों के आंगन का,

मैं उनका जिनके मन उपवन
में बहार झाँकती नहीं है,
मधुमासों की मस्त हवाएँ
किसी समय ताकती नहीं हैं,
भूल भटककर भी सुगंध
सुमनों का कभी नहीं आती,

मौसम लिखता पत्र न जिनको,
कली पत्र बाँचती नहीं है।
मैं लिखता हूँ पत्र कि जिनको
लिखता मौसम नहीं खिलन का,

जिनकी खड़ी उदास झोपड़ी
अपनी खुद कहकहे कहानी,
इंकलाब अभिशाप नहीं है
बात झोपड़ी समझ न पाती,
दीप बारता उस कुटिया में
पता नहीं जहाँ किरण का,

मैं उनका जिनके बेटों ने
आज़ादी का दाम चुकाया,
तोड़ गुलामी की जंजीरों
स्वतंत्रता का दीप जलाया,
उनका पेट नहीं भरता है,
वस्त्र न उनको मिल पाता है,

अपना सब कुछ नेवशावर कर,
जिसने सूनापन अपनाया,
पाँव चूमता जिनका जिन पर
छाया नहीं आज शासन का,

मैं गायक वीरान चमन का,
आँसू भरे उदास नयन का,
गा न सकूँगा गीत प्यार का,
मधुमासों का और मिलन का ।

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