जाने सपनों में आकर तुम, प्रिय गुरु को—
जब भी लिखता हूँ प्यार गीत, तुम विरह गीत बनाती हो।
पतझर को मैंने सहाया,
आँसुओं की गंगा तुमने भराई।
जाने क्षण-क्षण पथ पर मुझको, तुम क्यों भरमाती हो?
नापी सागर की गहराई,
भाँपी लहरों की तरुणाई।
लेकिन न अभी तक जान सका—
अधरों की तेरी अरुणाई।
क्षण पास हमारे आती हो, क्षण भर तुम उड़ जाती हो।
यह तुम कमजोरी मत समझो,
यह सीना-जोरी मत समझो।
यौवन तुझ में लहराता है,
तुम इसको चोरी मत समझो।
बाहों में आकर जाने, तुम क्यों तरसा कर हट जाती हो?
कब कहता हूँ तुम आओ मत,
कब कहता हूँ तुम जाओ मत।
लेकिन सपनों में छल कर तुम,
अधरों को यूँ तरसाओ मत।
जाने मुझको अपना तुम कह, फिर मुझको क्यों ठुकराती हो?
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