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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
फिर बुलाया है

न रोको आज जाने दो,
मुझे तुम यूँ न ताने दो।
किसी के प्यार की महफिल,
मुझे तुम फिर सजाने दो।
किसी ने माँग भर कर आज मुझको फिर बुलाया है।

मधुर है बीन यौवन की,
फुहारें प्यार सावन की।
अरे अधिकार मत छीनो,
है इच्छा प्यार पावन की।
सोने घाव भर कर आज मुझको फिर बुलाया है।

प्यार के पथ में थकन क्या,
प्यार में कटु है वचन क्या?
अनबनों के बाद जीवन में,
नहीं होता मिलन क्या?
किसी ने राह पाकर आज मुझको फिर बुलाया है।

गया है चाँद, आया है,
सपन फिर से सजाया है।
मगर वह कब से आज तक,
डर कर मन आया है।
किसी ने होठ अपना अधर पर फिर बुलाया है।

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