एक झलक, नयनों को देकर ।
चाँद न जाने कहाँ छिप गया ।।
अरमानों की गली-गली को,
मन उपवन की कली-कली को,
मधुर स्वप्न का आँचल देकर,
चाहों के पग, पायल देकर,
एक कसक, नयनों को देकर ।
चाँद न जाने कहाँ छिप गया ।।
नई किरण देकर प्रकाश की,
प्यास बढ़ाकर मधुर आश की,
छोड़ गया वह सूनापन है,
और दे गया, खालीपन है,
एक सिसक, नयनों को देकर ।
चाँद न जाने कहाँ छिप गया ।।
कण-कण मन का ढूढ़ रहा है,
बेदर्दी वह कहाँ छिपा है,
गया कहाँ वो जालिम चन्दा,
डाल गले में, डोरी-फन्दा,
एक बहक, नयनों को लेकर ।
चाँद न जाने कहाँ छिप गया ।।
गया, दे गया, कसक प्राण को
गया, दे गया, सिसक प्राण को
टीस दे गया, चुभन अनोखा,
किया कर गया, मुझसे धोखा
एक चहक, नयनों को देकर ।
चाँद न जाने कहाँ छिप गया ।।
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