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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
कैसे कोई

कैसे कोई उस यौवन को, आकर देता अपना आँचल ।
जिसके भाग्य-पटल पर अंकित, नहीं बहारों का मधुवन था ।।

टूटा डाँड, नाव थी जर्जर,
चलता था तूफान बवण्डर,
नीचे थाह नहीं था जल का,
ऊपर सिर पर काल भयंकर,

कैसे कोई उस किस्ती को, देता बता, किधर है साहिल ।
जिस पर लदी हुई निर्धनता, खेवनहार जहाँ निर्धन था ।।

लगा हुआ धर्मों का मेला,
जाति-पांति का ठेलम-ठेला,
सब आकर्षित थे, कंचन से,
राही पास दाम न धेला ,

कैसे कोई उस उपवन में, झंकृत करता पग का, पायल ।
जिसमें गंध-बहार लुटाये, ऐसा कोई नहीं, सुमन था ।।

नींद खुली, बीमार उमर थी,
फटी हुई अपनी चूनर थी,
लदी हुई थी, सिर पर गठरी,
झुकी कमर कमजोर नज़र थी,

जैसे कोई बंद न करता, देख उसे घर अपना सांकल |
जिस पथ से वह चला जा रहा, सिर्फ लाश थी नहीं कफ़न था ||

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