जिस दिवस भरनी गवाही, निर्बलों का छोड़ दोगी ।
तोड़ तुझको फेंक दूँगा, जान लो मेरी कलम तुम ।।
बिक चुका हूँ, हाथ जिनके,
साथ अत्याचार होता,
क्रूरताओं का, कि जिनके,
साथ है, व्यापार होता,
आँसुओं से तोड़ पाती है,
न जिसकी सांध रिस्ता ,
बिक रहा जिनका पसीना,
रक्त जिसका भाव सस्ता,
चल पड़ा हूँ साथ जिनका
पेट, रोटी माँगता है,
लाज ढकने के लिए तन,
सिर्फ कपड़ा चाहता है,
झोपड़ी वातानुकूलित का
न, सपना देखती है,
वस्तु वह केवल जरूरत
की, मिले बस सोचती है,
मौत की जयकार करती,
जा रही श्रमशीलता है,
व्यंग से वह पूछती क्या
सत्य यही स्वतंत्रता है ?
निर्धनों के साथ रहने की, कसम जब तोड़ लोगी ।
तोड़ तुझको फेंक दूँगा, जान लो मेरी कलम तुम ।।
झोपड़ी के रास्ते से पाँव जब तुम, मोड़ लोगी ।
तोड़ तुझको फेंक दूँगा, जान लो मेरी कलम तुम ।।
जिस दिवस भरनी गवाही, निर्बलों का छोड़ दोगी ।
तोड़ तुझको फेंक दूँगा, जान लो मेरी कलम तुम ।।
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