प्यासे होठ माँगते पानी,
मौसम करता आनाकानी,
बोलो कैसे प्यास बुझे, जब मनमानी करता है अम्बर ।
जब कंचन की मोहकता से,
मन्दिर की प्रतिमा आकर्षित,
निर्धन जब वंचित रह जाता,
स्नेह-सुमन करने से अर्पित,
शेष नहीं जब है पावनता,
मन्दिर में भी रही न समता,
बोलो कैसे रहे आस्था, भेद-भाव जब करता मन्दिर ।
रेशम के कच्चे धागों का,
बन्धन जब स्वीकार नहीं है,
कैसे पावन प्यार कहूं जब
खुलता मन का द्वार नहीं है,
प्राण नहीं जब बन्धन माने,
त्याग न करती कंगन जाने,
बोलो कैसे पावन कह दूँ जब स्वीकार न करता अन्तर ।
बचपन में ही तोड़ चले जब,
साथ निभाने के सब वादे,
और उपेक्षित ही रह जायें,
साधक की सारी फरियादें,
किरण आशा की जब बुझ जाये,
मंजिल का पथ नजर न आये,
बोली कैसे पाँव बढ़ें, जब खड़ी निराशा बाधक बनकर ।
लाख जलाने पर भी दीपक,
है जलने का नाम न लेता,
मन तुम से व्याकुल जब आँगन का,
दीपक दामन थाम न लेता,
दीपक जब कर्तव्य भुला दे,
तम से वह समझौता कर ले,
बोलो कैसे तम मिट पाती, दीप न दे प्रकाश जब जलकर ।
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