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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
खबर देता रहूँगा

तुम मुझे मुस्कान, अपने होठ की देना न देना |
मैं तुझे मधुमास आने की खबर, देता रहूँगा ।।

तुम मुझे मुस्कान, अपने होठ की देना न देना |
मैं तुझे मधुमास आने की खबर, देता रहूँगा ।।

चाह तेरी चाँदनी है,

और मेरी रात काली,

हाथ में कंगन तुम्हारे,

और मेरा पात्र खाली

तुम मुझे अनुमान, अपनी चाह का देना न देना ।
मैं तुझे मधुमास आने की खबर, देता रहूँगा ।।

प्यार का पनघट तुम्हारी,

साँस के हर तार पर है,

और मेरे होठ पर कुछ

दर्द भरते आह स्वर हैं,

तृप्ति मेरे तृषित अधरों को भले, देना न देना ।
मैं तुझे मधुमास आने की खबर, देता रहूँगा ।।

हर सुबह की किरण तेरे,

हाथ पर मेहंदी रचाती,

और है हर शाम विधवा,

बन विहरन द्वार आती

सुबह किरणों का शुभ आभास तुम, देना न देना ।
मैं तुम्हे बस शाम आने की खबर देता रहूँगा ।।

तुम मुझे मुस्कान, अपने होठ की देना न देना ।
मैं तुझे मधुमास आने की खबर, देता रहूँगा ।।

मुक्ति नाथ त्रिपाठी मृदुल
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