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मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"

स्वर्ग से बढ़कर

स्वर्ग से बढ़कर धरा होती

अगर आदमी को आदमी छलता नहीं

भाव समता का लिए चलता पवन

भेद का प्रतिकार करती है किरण

क्षेत्र,धर्म और जाति में यहाँ

भेदभाव का बना वातावरण

दौड़ता भगवान खुद आता

अगर भेदभाव का पवन चलता नहीं

मृत्यु के उपरांत जो भी आवरण

नाम सबका एक होता है कफन

तब नहीं क्यों महल कुटिया में यहाँ

है नहीं समता न होता है मिलन

स्नेह का मौसम सदा रहता यहाँ

स्वार्थ का दीपक अगर जलता नहीं

भूमि पर रखना ज़रूरी पाँव है

और जो आकाश सबका छाँव है

यह विषमता देखकर रोता हृदय

हर नगर हर गाँव में अलगाव है

हर्ष का वातावरण रहता सदा

यदि विषमता का बीज उगता नहीं

है जिसे उपहार तत्वों का मिला

आदमी सा पुष्प जिस पर है खिला

है नहीं आती समझ में बात यह

लोक कोई दूसरा भू से है भला

स्वर्ग से बढ़कर धरा होती

अगर आदमी को आदमी छलता नहीं

मुक्ति नाथ त्रिपाठी मृदुल
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