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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
बदल दो साथी

स्वर्ग से बढ़कर धरा होती
अगर आदमी को आदमी छलता नहीं

स्वर भंग अगर करता है, तो,
तुम साज़ बदल दो साथी,

पग उठें डगर पर चलो, मगर
मंजिल का नहीं ठिकाना हो,
बढ़ने की चाह हो मन में,
चलने का सिर्फ बहाना हो,

बाधा से लड़ने से डरे,
हो लगन न मन के आँगन में,
शूलों के पथ से दूर हटे,
उत्साह नहीं यदि हो मन में,

अरमान न हो बढ़ने का तो,
अन्दाज बदल दो साथी ।
स्वर भंग अगर करता है तो,
तुम साज़ बदल दो साथी ।।

मृदुता कीं कमजोरी का स्वर,
समझा जाये, अपमान मिले,
झुकना कोई नमता की कहे,
यदि अर्थ क्षमा का ही बदले,

जब सहनशीलता का आँचल,
खींचे कोई अत्याचारी,
द्रौपदी हया का चीर-हरण
करने की यदि हो तैयारी,

हो गलत अर्थ मृदुता का तो,
आवाज बदल दो साथी ।
स्वर भंग अगर करता है, तो
तुम साज़ बदल दो साथी ।।

महलों में सूरज रोज उगे,
हो दीप नहीं झोपड़ियों में,
कुत्ते तो लें, रस व्यंजन
नर के न अनाज, अंतड़ियों में,

व्याभिचारी पायें राजपदक,
बलिदानों को उपमान मिले,
श्रम चिथड़ों से तन ढकता हो,
मानव की नंगी लास जले,

जो अन्तर की रवाई न भरे,
वह राज़ बदल दो साथी ।
स्वर भंग अगर करता है तो
तुम साज़ बदल दो साथी ।।

शासन करता हो स्वार्थ अगर,
बेईमानी यदि बसर करे,
जब भ्रष्ट तरीकों का पोषण
करने में ताज़ न लाज करे,

जब मर्यादाओं की सीमा,
का रोज उलंघन होता हो,
अपना ही रक्त पसीना दे,
उसका ही शोषण होता हो,

जो हाथ स्वार्थ के चिक जायें,
वह ताज़ बदल दो साथी ।
स्वर भंग अगर करता है तो
तुम साज बदल दो साथी ।।

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