पापाजी, आपकी लेखनी आज भी बोलती है।
आपके शब्दों में आपकी साँसें हैं,आपकी आवाज़ है, आपके विचार हैं ।
यह संग्रह उन्हीं संवेदनाओं को सुरक्षित रखने का मेरा प्रयास है।
यह संग्रह मेरे पूज्य पिता, श्रद्धेय श्री मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल" जी, की उन कविताओं का संकलन है, जो उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों पर अपनी लेखनी से रचीं। ये कविताएँ उनके हृदय की गहराइयों से निकली हैं — कभी समाज की पीड़ा देखकर, कभी प्रकृति का सौंदर्य निहारकर, कभी देश-प्रेम की लौ जलाकर, और कभी जीवन के अनकहे दर्द को शब्द देकर।
पापाजी एक गहरे संवेदनशील कवि हैं । उनकी कविताओं में एक ऐसा स्वर है जो मन को झकझोरता है , एक ऐसी आँच है जो हृदय को उद्वेलित करती है । वे सच्चाई से कभी न डरे, न झुके। उनकी कलम ने जो कहा, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है — चाहे वह किसी अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ हो, किसी प्रिय की याद हो, या जीवन के दर्शन की कोई गहरी बात।
इस संग्रह में दो पुस्तकों की कविताएँ सम्मिलित हैं — प्रथम संग्रह की पचास और द्वितीय संग्रह की इक्यावन कविताएँ। ये १०१ कविताएँ न केवल पापाजी की लेखनी की विविधता और गहराई को दर्शाती हैं, बल्कि उनके जीवन के विभिन्न अनुभवों और विचारों का भी प्रतिबिंब हैं। हर कविता में उनकी संवेदनशीलता, उनकी सामाजिक चेतना, और उनकी मानवीयता की झलक मिलती है।
मैं, उनका पुत्र प्रसून त्रिपाठी, इन कविताओं को डिजिटल रूप में संरक्षित और प्रकाशित करके उन्हें समस्त परिवार की तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। मेरी यह छोटी-सी कोशिश है कि उनके शब्द, उनके विचार, और उनकी भावनाएँ — जो इन पंक्तियों में आज भी जीवित हैं — अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचें, उनके हृदय को छुएँ, और शायद हमें मानव जीवन की गहरी बातों को समझने और उनमे सार्थकता और सकारात्मकता ढूढ़ने में साथी बन सकें ..